
लखनऊ। बृज की रसोई में चल रही पद्मविभूषण तुलसीपीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य महाराज की नौ दिवसीय रामकथा मंगलवार को संपन्न हो गई। कथा के अंतिम दिन उन्होंने नवधा भक्ति के सख्य भाव (मित्रता का भाव) की व्याख्या करते हुए कहा कि सच्ची मित्रता भगवान के चरणों में अटूट विश्वास का नाम है। उन्होंने कहा कि जिसका मन अपने लक्ष्य पर स्थिर रहता है, वही लक्ष्मण कहलाता है। कहा कि संस्कृति की रक्षा से ही राष्ट्र मजबूत होगा।
रामभद्राचार्य ने रामायण के प्रसंगों के माध्यम से भारतीय संस्कृति की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रावण विदेशी आक्रांता का प्रतीक है, जबकि सीता भारतीय संस्कृति का स्वरूप हैं। संस्कृति की रक्षा के लिए ही वानर और भालू समाज एकजुट हुआ था। उन्होंने ताड़ना का अर्थ शिक्षण बताते हुए प्रचलित चौपाइयों की भी व्याख्या की।
सुंदरकांड और हनुमान चालीसा पाठ का आह्वान
रामभद्राचार्य ने श्रद्धालुओं से नियमित रूप से सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का पाठ करने का आग्रह किया। साथ ही भारत को अखंड, अजेय और सार्वभौम बनाने का संदेश भी दिया। मीडिया प्रभारी डॉ. एस.के. गोपाल ने बताया कि श्रीश्याम परिवार के सौजन्य से आयोजित भंडारे में हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। इस अवसर पर श्रीश्याम परिवार, मारवाड़ी युवा मंच, सिविल डिफेंस, एकल अभियान, बोरा फाउंडेशन, इंटरनेशनल वैश्य फेडरेशन, संस्था उत्सव और अन्य सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं का सम्मान भी किया गया।