परमार्थ निकेतन में आयोजित कथावाचक रमेश भाई ओझा की सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने सहभाग कर आध्यात्मिक ऊर्जा, संस्कारों और आत्मिक शांति का अद्भुत अनुभव किया। सात दिवसीय कथा के माध्यम से हरित कथा, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण एवं स्वच्छता जैसे अनेक महत्वपूर्ण संकल्प भी लिए गए। श्रद्धालुओं को पौधरोपण, प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली अपनाने और जल बचाने के लिए प्रेरित किया गया।आश्रमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने मातृ दिवस पर कहा कि वैसे तो हर दिन, हर क्षण, हर पल ही मातृ शक्ति को समर्पित है। आज हम उन पांच माताओं का वंदन करें, जिनसे हमारा अस्तित्व है, हमें जीवन मिला, संस्कार प्राप्त हुए और हमारे जीवन को दिशा मिली। वह जननी, जिसने हमें अपने अन्न से पोषित किया, अपनी ममता से सींचा, अपने आंचल में सुरक्षा दी और अपने आशीर्वाद से हर तूफान में हमें संभाला। जब-जब हमें जरूरत पड़ी, मां ने हमें संभाला, जब हम डरे, मां ने साहस दिया, जब हम भटके, मां ने मार्ग दिखाया। मां सिर्फ एक शब्द नहीं, वह ईश्वर के प्रेम का सजीव स्वरूप है। हमारी मातृभूमि भारत माता, जिनकी मिट्टी में बलिदानों की सुगंध है, जिनकी धरा ऋषियों की तपोभूमि, वीरों की कर्मभूमि और संतों की ज्ञानभूमि रही है। डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि जब हम कथा श्रवण करते हैं तो हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा, आत्मिक शांति और ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव जागृत होता है। मातृ दिवस गोपूजन कर मातृ शक्ति का अभिनंदन किया गया।

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