उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार को कौन नहीं जानता? यह पूरी दुनिया में एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। इसे ‘कुंभ नगरी’ भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ, तो उसमें से अमृत कलश निकला था।इस कलश को ले जाते समय अमृत की कुछ बूंदें धरती के चार स्थानों- हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में छलक कर गिरी थीं। हरिद्वार की हर की पौड़ी में अमृत की बूंदें गिरने के कारण ही यहां हर 12 साल में महाकुंभ का भव्य आयोजन होता है, जहां दुनियाभर से लोग गंगा में आस्था की डुबकी लगाने आते हैं। स्कंद पुराण एवं पद्म पुराण में इस कथा का वर्णन स्पष्ट रूप से मिलता है।
कुशावर्त घाट की क्या मान्यताएं हैं?कुशावर्त घाट की अपनी एक बेहद प्राचीन और समृद्ध मान्यता है। विष्णु पुराण, शिव पुराण और स्कंद पुराण के केदारखंड जैसे पवित्र ग्रंथों में भी इस स्थान की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। मान्यता है कि प्राचीन काल में यहां कुशा (एक प्रकार की पवित्र घास) के बहुत से पौधे हुआ करते थे।धार्मिक कथाओं के अनुसार, त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने अपने पिता और सभी पूर्वजों के उद्धार के लिए इसी कुशावर्त घाट पर पिंडदान और तर्पण किया था। बाद में, द्वापर युग में पांडवों ने भी महाभारत युद्ध के बाद अपने परिजनों की आत्मा की शांति के लिए यहीं आकर कर्मकांड किए थे।क्यों मशहूर है ये घाट?यह घाट भगवान विष्णु के अवतार दत्तात्रेय की तपोस्थली के रूप में भी विश्व विख्यात है। मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय ने इस स्थान पर कई हजार सालों तक घोर तपस्या की थी। आज भी इस घाट पर उनका एक मंदिर मौजूद है। इसके अलावा, मैत्रेय मुनि ने इसी पावन तट पर विदुर जी को भागवत कथा का उपदेश भी दिया था। यही कारण है कि पूर्वजों की शांति, कर्मकांड और मुंडन संस्कार के लिए कुशावर्त घाट को एक बेहद पवित्र और फलदायी स्थान माना जाता है।