एक लोक कथा है। पुराने समय में एक राजा के जीवन में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन उसका मन हमेशा अशांत रहता था। वह छोटी-छोटी बातों को लेकर चिंतित रहता और रात में भी ठीक से सो नहीं पाता था।एक दिन परेशान होकर राजा अपने राज्य के विद्वान संत के पास पहुंचा। उसने संत के चरणों में बैठकर कहा, “गुरुदेव, मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है, फिर भी मेरे मन को शांति नहीं मिलती। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए, जिससे मेरा मन शांत हो सके।”संत ने उसकी बात सुनी, लेकिन कोई उत्तर नहीं दिया। वे तुरंत उठे और आश्रम के बाहर की ओर चल पड़े। राजा भी उनके पीछे-पीछे चल दिया।आश्रम से बाहर आकर संत ने कुछ सूखी लकड़ियां इकट्ठी कीं और उन्हें एक जगह रखकर आग जला दी। कुछ देर बाद आग जलने लगी। संत थोड़ी-थोड़ी देर में एक लकड़ी उठाकर आग में डालते जाते। जैसे-जैसे लकड़ियां बढ़ती गईं, आग और तेज होती गई।
राजा चुपचाप यह सब देखता रहा। कुछ देर बाद संत वापस आश्रम में आए और अपनी जगह पर बैठ गए। राजा भी पीछे-पीछे आ गया, उसने विनम्रता से पूछा, “गुरुदेव, आपने अभी जो किया, उससे मेरी समस्या का क्या संबंध है?”संत मुस्कुराए और बोले, “राजन्, मैंने आपकी समस्या का उत्तर अभी-अभी दिया है, लेकिन आप उसे समझ नहीं पाए।”राजा ने आश्चर्य से पूछा, “कैसे?”संत ने कहा, “हर व्यक्ति के भीतर भी एक आग होती है। यदि उस आग में प्रेम, करुणा, संतोष और सेवा की लकड़ियां डालेंगे, तो जीवन में शांति और प्रसन्नता आएगी, लेकिन अगर हम उसमें क्रोध, लालच, मोह, ईर्ष्या और अहंकार की लकड़ियां डालते रहेंगे, तो मन में अशांति की आग लगातार भड़कती रहेगी।”राजा को संत की बात समझ आने लगी।संत ने आगे कहा, “शांति बाहर की वस्तुओं से नहीं, भीतर की आदतों से मिलती है। अगर तुम मन को शांत करना चाहते हो, तो अपनी बुरी आदतों को छोड़ो और लोगों से निस्वार्थ प्रेम करना सीखो।”उस दिन से राजा ने अपने व्यवहार पर ध्यान देना शुरू किया। धीरे-धीरे उसने क्रोध और लालच को कम किया, दूसरों की मदद करने लगा और अपने जीवन में संतोष को स्थान दिया। कुछ समय बाद उसे वही शांति मिलने लगी, जिसकी तलाश वह वर्षों से कर रहा था।प्रसंग की सीखगुस्से को नियंत्रित करें – गुस्सा आने पर तुरंत जवाब देने के बजाय कुछ क्षण रुकें। गहरी सांस लें और सोचें कि आपकी प्रतिक्रिया समस्या को हल करेगी या बढ़ाएगी। कई रिश्ते केवल इसलिए खराब हो जाते हैं, क्योंकि हम कुछ सेकंड का धैर्य नहीं रख पाते।जरूरत और लालच में अंतर समझें – जरूरत पूरी करने के बाद भी लगातार अधिक पाने की इच्छा मन को बेचैन रखती है। इसलिए समय-समय पर खुद से पूछें- “क्या मुझे वास्तव में इस चीज की जरूरत है?” संतोष का अभ्यास मानसिक शांति का मजबूत आधार है।दूसरों से तुलना कम करें – हर व्यक्ति का जीवन, परिस्थिति और संघर्ष अलग होता है। दूसरों की उपलब्धियों से अपनी तुलना करने के बजाय अपनी प्रगति पर ध्यान दें। कल की तुलना में आज थोड़ा बेहतर बनना ही सफलता है।मन में प्रेम और करुणा बढ़ाएं – निस्वार्थ भाव से किसी की मदद करना, किसी की बात ध्यान से सुनना या किसी परेशान व्यक्ति को कुछ अच्छे शब्द कहना मन को सकारात्मक बनाता है। प्रेम जितना बांटते हैं, भीतर उतनी ही सकारात्मकता बढ़ती है।व्यर्थ के विचारों को पहचानें – हर विचार जरूरी नहीं होता। बीती बातों पर बार-बार पछताने और भविष्य की अनिश्चितताओं की चिंता करने के बजाय वर्तमान पर ध्यान दें। जब मन भटके, तो उसे वर्तमान काम पर ले आएं, इधर-उधर की बातों में भटकने न दें।रोज थोड़ा समय खुद के लिए निकालें – कुछ मिनट शांत बैठना, प्रार्थना, ध्यान, प्रकृति के बीच समय बिताना या अपनी पसंद का काम करना मानसिक थकान कम कर सकता है। मन को भी आराम की जरूरत होती है।