काठमांडू के निकट चंदेश्वरी मंदिर परिसर में स्थित देवी काली की प्रतिमा।पौराणिक देवी-देवताओं की प्रारंभिक प्रतिमाएं पांचवीं सदी के बाद ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के क्षेत्रों की गुफाओं और मंदिरों में दिखाई देने लगती हैं। इनमें कुछ प्रतिमाएं उग्र देवियों की हैं। सबसे प्रसिद्ध प्रतिमाओं में से एक में देवी को सिंह पर सवार होकर महिषासुर से युद्ध करते हुए दिखाया गया है। आज हम इस देवी को दुर्गा के नाम से जानते हैं। कुछ अन्य प्रतिमाओं में देवियों का क्षीण शरीर, हड्डियों, खोपड़ियों और अंतड़ियों की माला से सुसज्जित दिखाया गया है। उनके हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं। आज ऐसी प्रतिमाओं की पहचान चामुंडा देवी के रूप में की जाती है।तो ये देवियां कौन हैं? उस काल के संस्कृत ग्रंथों में एक “महादेवी’ का उल्लेख मिलता है, जो विष्णु के योगनिद्रा में होने के दौरान जागृत रहकर संसार को हानिकारक और द्वेषपूर्ण शक्तियों से सुरक्षित रखती हैं। वैष्णव ग्रंथों में उन्हें योगमाया कहा गया है। उन्हें शिव की पत्नी और शक्ति के रूप में भी पहचाना जाता है। वे असुर राजा महिष से युद्ध करती हैं, जिसे इतना अहंकार था कि वह किसी स्त्री से आश्रय लेने से इनकार कर देता है।रक्तबीज या अंधक जैसे असुरों की कथा भी इसी उग्र देवी परंपरा से जुड़ी है। मान्यता है कि रक्त की हर बूंद धरती पर गिरते ही उसी असुर का एक नया रूप उत्पन्न कर देती थी। इस संकट को रोकने के लिए शिव और शक्ति उग्र देवियों का आवाहन करते हैं, ताकि रक्त की बूंदों को धरती पर गिरने से पहले ही रोक लिया जाए। चामुंडा और काली इन्हीं देवियों में प्रमुख हैं।समय के साथ काली की पहचान चामुंडा से अलग और अधिक विशिष्ट रूप में विकसित हुई। चामुंडा को प्रायः क्षीण शरीर, नुकीले दांतों और शमशान से जुड़े भयावह परिवेश में दिखाया जाता है। इसके विपरीत काली को कृष्ण वर्ण की सुंदर देवी के रूप में चित्रित किया जाता है, जिनकी जीभ बाहर निकली हुई है। हालांकि उनकी सुंदरता उन लोगों के कटे हुए अंगों और सिरों से बनी माला से घिरी दिखाई देती है, जिनका उन्होंने वध किया है। शिव के शरीर पर नृत्य करती काली को श्मशान से भी जोड़ा जाता है।वज्रयान बौद्ध धर्म के ग्रंथों में भी ऐसी ही उग्र योगिनियों और डाकिनियों का उल्लेख मिलता है। इनमें वे हेरुक जैसे उग्र जीवों के चारों ओर नृत्य करती हैं और महाकाल जैसी शक्तियां उन्हें नियंत्रित करती हैं। इन उग्र देवियों की प्रबलता अनियंत्रित होती है। इस अर्थ में वे अनियंत्रित और आदिम शक्ति का प्रतीक हैं। यही कारण है कि वे शमशानों और घने जंगलों जैसी जगहों से जुड़ी हैं।जहां वैदिक परंपरा इन देवियों को इंद्रजाल और रहस्यमय शक्तियों से जोड़ते हुए उनसे एक दूरी बनाए रखती है, वहीं तांत्रिक ग्रंथ उन्हें मातृका और महाविद्या के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। तंत्र परंपरा में यही उग्र शक्तियां मुक्ति का मार्ग दिखाने वाली देवी बन जाती हैं। वे समूह में भी दिखाई देती हैं और स्वतंत्र रूप में भी। वैदिक ग्रंथों में इनका उल्लेख अपेक्षाकृत कम मिलता है।महाभारत में, सप्तर्षियों का उल्लेख है, जो अपनी पत्नियों पर विश्वासघात का आरोप लगाते हैं।केवल अरुंधति अपनी निष्ठा प्रमाणित कर पाती हैं। अन्य पत्नियों को घर से बाहर जाना पड़ता है और वे कृत्तिका नक्षत्र बन जाती हैं। यही कृत्तिकाएं शिवपुत्र कार्तिकेय की धाय माताएं भी मानी जाती हैं।पौराणिक परंपरा में काली और गौरी एक ही देवी के दो भिन्न स्वरूपों के रूप में सामने आती हैं। एक ओर काली का उग्र रूप है, जो मृत्यु और क्षय से जुड़ा है और शिव के शरीर पर नृत्य करता है। दूसरी ओर गौरी का सौम्य स्वरूप है, जो शिव के साथ गृहस्थ जीवन बसाती है। काली के केश खुले होते हैं, जबकि गौरी केशों को बांधे हुए और वस्त्रों से सुसज्जित दिखाई देती हैं।देश के विभिन्न हिस्सों में तीज, गणगौर और मंगला गौरी जैसे त्योहार देवी के इसी सौम्य और गृहस्थ रूप का उत्सव मनाते हैं। जब तपस्वी गृहस्थ बन जाता है तब वन खेत में बदल जाता है।इन रूपकों के माध्यम से बौद्ध और जैन परंपराओं में व्यक्त संयम और विरक्ति के आदर्शों के समानांतर एक अलग जीवन-दृष्टि सामने आती है।वेदांत परंपरा में काली का संबंध भैरव से भी जोड़ा जाता है। भैरव स्वयं अत्यंत उग्र स्वरूप वाले हैं। काली का संबंध हनुमान से भी जोड़ा जाता है, जो ब्रह्मचर्य और संयम के माध्यम से अपनी शक्ति प्राप्त करते हैं।इस तरह हिंदू परंपरा में विपरीत दिखाई देने वाली शक्तियां एक-दूसरे का संतुलन करती और एक-दूसरे की पूरक बनती हैं। हालांकि विशुद्ध शक्तियां अशुद्ध शक्तियों को नकारती हैं, लेकिन अशुद्ध शक्तियां भी प्रबल मानी जाती हैं। जिसे वैदिक संस्कृति सीमित या निषिद्ध मानती है, तांत्रिक संस्कृति कई बार उसी को आध्यात्मिक अनुभव और शक्ति का माध्यम बनाती है। इस अर्थ में दोनों हिंदू धर्म की परस्पर संवाद करती हुई धाराएं हैं।इन परंपराओं के बीच कई तरह के तनाव दिखाई देते हैं – गृहस्थ और वन के बीच, शुद्ध और दूषित के बीच, मुख्यधारा और हाशिए के बीच, नियंत्रित और अनियंत्रित के बीच।एक प्रकार की देवी की प्रतिमा हमें सुरक्षा और आश्वस्ति का अनुभव कराती है, जबकि दूसरी हमारे भीतर भय और असुरक्षा पैदा करती है। देवी हमें प्रिय भी लगती हैं और उनके उग्र रूप से हम विचलित भी होते हैं। वे एक ही समय में आकर्षक और भयावह, जीवनदायिनी और विनाशकारी दिखाई दे सकती हैं।शायद इसी द्वंद्व में देवी की पूर्णता निहित है – दूध देने वाली गाय और रक्त पीने वाली बाघिनी, स्नेह से आलिंगन करने वाली मां और अपनी जीभ बाहर निकालकर हमें हमारी सीमाओं का अहसास कराने वाली काली। हिंदू परंपरा इन दोनों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानती। दोनों को साथ रखकर ही शक्ति का संपूर्ण स्वरूप सामने आता है