अयोध्या। होली के बाद पड़ने वाले प्रथम मंगल की परंपरा के तहत सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास में संतों ने भगवान श्रीराम और माता सीता के स्वरूपों के साथ भक्ति और उल्लास से भरी होली खेली। अबीर-गुलाल और पुष्प पंखुड़ियों की वर्षा के बीच संतों का अपने आराध्य के प्रति गहरा प्रेम और समर्पण झलक उठा।
उत्सव के दौरान लक्ष्मणकिला के अधीश्वर महंत मैथिलीरमणशरण की अध्यक्षता में संतों की दो टोलियां बनाई गईं। एक टोली भगवान श्रीराम के पक्ष में तो दूसरी माता सीता के पक्ष में खड़ी हुई। फाग गीतों, अबीर-गुलाल और हंसी-ठिठोली के बीच शुरू हुआ यह प्रतीकात्मक उत्सव कई घंटों तक चलता रहा और अंत में प्रेम व आत्मीयता के भाव के साथ संपन्न हुआ।
इस दौरान मधुकरी संत मिथिलाबिहारीदास सहित संत परंपरा के कई गायकों ने फाग और भक्ति गीतों की प्रस्तुति देकर माहौल को भक्तिमय बना दिया। कार्यक्रम में प्रसिद्ध विद्वान वागीश शुक्ल भी मौजूद रहे।
इस अवसर पर पीठाधीश्वर महंत मिथिलेशनंदिनीशरण ने कहा कि संतों के लिए आराध्य केवल प्रतिमाओं तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे चेतना के रूप में हर सुख-दुख के साक्षी और मार्गदर्शक हैं। उन्होंने कहा कि आराध्य के प्रति यह अनुभूति जितनी गहरी होती है, साधना और संतत्व भी उतना ही परिपक्व होता जाता है।