महाशिवरात्रि पर शिव-गौरा असमिया वैभव में सजेंगे। बाबा विश्वनाथ चेलेंग-गसोमा धारण करेंगे। वहीं माता गौरा रेशमी मखेला साड़ी से अलंकृत होंगी।

देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि पर शिव–गौरा पहली बार असमिया वैभव में दिखेंगे। बाबा विश्वनाथ धारण करेंगे ‘चेलेंग–गसोमा’, तो माता गौरा रेशमी मेखेला साड़ी और जूनबीरी आभूषणों से अलंकृत होंगी। भक्त बराती बनकर उत्सव का हिस्सा बनेंगे।
महाशिवरात्रि में एक सप्ताह बचा है। शिव-विवाह की सदियों पुरानी परंपराओं को लेकर तैयारियां चरम पर हैं। टेढ़ीनीम स्थित विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत आवास पर बाबा विश्वनाथ की हल्दी, शिव-विवाह, शिव बारात और गौना की रस्मों को लेकर माहौल भक्तिमय हो उठा है। महाशिवरात्रि पर बाबा विश्वनाथ और माता गौरा का शृंगार आकर्षण का केंद्र होगा। पहली बार शिव–गौरा की चल प्रतिमा असमिया पारंपरिक परिधान और आभूषणों में सजेगी।
पूर्व महंत के पुत्र वाचस्पति तिवारी ने बताया कि महाशिवरात्रि पर बाबा विश्वनाथ और माता गौरा के परिधान असम के शिवसागर से मंगाए गए हैं। यह शृंगार न केवल परिधान की दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक संदेश के रूप में भी महत्वपूर्ण है। इससे काशी और असम की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं का सुंदर संगम देखने को मिलेगा।
बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को असमिया पुरुष परिधान ‘चेलेंग और गसोमा’ से सजाया जाएगा। यह परिधान वहां की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इस परिधान में बाबा राजसी और दिव्य दिखाई देंगे। वहीं, माता गौरा को लाल और सुनहरे रंग की रेशमी ‘मेखेला साड़ी’ पहनाई जाएगी, जो असम की पारंपरिक स्त्री पोशाक है। असमिया जूनबीरी (अर्धचंद्राकार हार), गुमखारू (पारंपरिक कंगन) और थुरिया (मांगटिका) से भी शृंगार होगा। इन आभूषणों के साथ माता गौरा का स्वरूप एक नववधू के रूप में अलौकिक दिखाई देगा।