
मकर संक्रांति पर परमार्थ निकेतन गंगा तट पर स्वामी चिदानंद सरस्वती, ऋषि कुमारों और विश्व के अनेक देशों से आए श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ गंगा में डुबकी लगायी।
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि मकर संक्रांति का स्नान जीवन में नए संकल्प और नई ऊर्जा का आह्वान करता है। मकर संक्रांति के समय सूर्य की स्थिति और पृथ्वी के झुकाव में परिवर्तन से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ठंडे जल में स्नान करने से रक्त संचार बेहतर होता है, प्रतिरक्षा प्रणाली सुदृढ़ होती है और शरीर में नवस्फूर्ति का संचार होता है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषियों ने इस दिन स्नान को स्वास्थ्य और संतुलन से जोड़ा है।
यह पर्व जीवन में परिवर्तन को पवित्रता और सकारात्मकता के साथ स्वीकार करने का संदेश देता है। सूर्य जब अपनी दिशा बदलता है, तो ऐसे समय हमें भी अपने जीवन की दिशा को प्रकाश, सेवा और सद्भाव की ओर मोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। स्वामी ने कहा कि मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाना भी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वह हमें संदेश देता है कि ऊंचाई पर पहुंचने के लिए संतुलन, धैर्य और सही दिशा आवश्यक है। यदि डोर ढीली हो, तो पतंग गिर जाती है। यदि अत्यधिक खिंचाव हो, तो टूट जाती है। जीवन भी इसी संतुलन का नाम है। जीवन रुकने व थकने का नहीं बल्कि सूर्य की तरह आगे बढ़ते रहने और प्रकाश देने का संदेश देती है।