मेला क्षेत्र के सेक्टर छह में कल्पवास कर रहे 25 वर्षीय दंडी संन्यासी स्वामी अनंतानंद सरस्वती संन्यासी परंपरा के जीवंत प्रतीक बन चुके हैं। उन्होंने 12 वर्ष की आयु में निष्ठ ब्रह्मचर्य की कठिन साधना का मार्ग अपनाया और तपस्वी जीवन की नींव रखी।

मेला क्षेत्र के सेक्टर छह में कल्पवास कर रहे 25 वर्षीय दंडी संन्यासी स्वामी अनंतानंद सरस्वती संन्यासी परंपरा के जीवंत प्रतीक बन चुके हैं। उन्होंने 12 वर्ष की आयु में निष्ठ ब्रह्मचर्य की कठिन साधना का मार्ग अपनाया और तपस्वी जीवन की नींव रखी।
वर्ष 2013 के कुंभ मेले में निष्ठ ब्रह्मचर्य की दीक्षा प्राप्त करने वाले अनंतानंद सरस्वती ने वर्ष 2025 के कुंभ में दंडी संन्यास की उच्चतम दीक्षा ग्रहण की। 23 वर्ष की आयु में संन्यास स्वीकार कर उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को धर्म और साधना को समर्पित कर दिया। मूल रूप से वाराणसी निवासी स्वामी अनंतानंद सरस्वती ने ब्रह्मचर्य काल के दौरान वेद, पुराण व वैदिक शास्त्रों की परंपरागत और गहन शिक्षा प्राप्त की।
उन्हें संन्यास की प्रारंभिक शिक्षा स्वामी स्वरूपानंद महाराज से प्राप्त हुई। दंडी संन्यास ग्रहण करने के पश्चात अग्नि का पूर्ण परित्याग किया जाता है, जिसके कारण वे स्वयं भोजन नहीं बनाते और केवल एक समय भिक्षा में प्राप्त भोजन ही ग्रहण करते हैं। परिभ्राजक जीवन के नियमों के अनुसार वे किसी एक घर में अधिकतम तीन दिन तथा किसी नगर में सोलह दिन से अधिक नहीं ठहरते।
ये कठोर अनुशासन उनकी तपस्या और संकल्प की दृढ़ता को दर्शाते हैं। उनके संन्यास जीवन का एकमात्र उद्देश्य धर्म का प्रचार-प्रसार है। वे समाज को वैदिक ज्ञान, शास्त्रीय परंपराओं और पुराणों की महिमा से परिचित कराते हैं। उनका जीवन परंपरा, तपस्या और पूर्ण समर्पण का अनुपम उदाहरण है। ऐसे संन्यासियों की उपस्थिति से माघ मेले की आध्यात्मिक गरिमा और अधिक बढ़ जाती है तथा सनातन धर्म की अमर परंपरा जीवंत बनी रहती है।