काशी में होने वाले इस आयोजन काे लेकर तैयारी चल रही है। महाश्मशान हरिश्चंद्र घाट पर स्थित अघोरपीठ पर पौष मास की पूर्णिमा से प्रारंभ है। इसमें विशेष तांत्रिक पूजन और हवन होगा।

धर्म क्रम और आध्यात्म की त्रिवेणी काशी में पौष मास की पूर्णिमा से चैत्र माह की पूर्णिमा तक विशेष तांत्रिक पूजन और हवन का आयोजन किया जा रहा है। हरिश्चंद्र घाट पर यह पूजन 90 दिनों तक चलेगा। इसमें महाश्मशान घाट पर रहने वाले अघोरी मार्तंड भैरव, गायत्री और मां चामुंडा का आवाहन करेंगे। इस पूजन में भगवान शिव के 28वें स्वरूप एवं तंत्र विद्या के देवता लकुलीश की विशेष पूजन होगी।
महाश्मशान हरिश्चंद्र घाट पर स्थित अघोरपीठ पर पौष मास की पूर्णिमा से प्रारंभ है। इस तंत्र विद्या के पूजन का अनुष्ठान गुरु अघोराचार्य कपाली बाबा महाराज ने लिया है। जबकि पूजन ब्रह्महिष्ठा भैरव स्वामी आश्रम ट्रस्ट के सानिध्य में संपन्न हो रहा है। पूजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं साधक सहभागिता कर भगवान की कृपा प्राप्त कर अपने आध्यात्मिक उत्थान का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
इस अनुष्ठान की विशेष व्यवस्था के अंतर्गत दिवस काल में शिव पंचाक्षरी मंत्र का जप एवं रुद्र गायत्री हवन संपन्न किया जा रहा है। वहीं रात 12:00 बजे से भोर 5:00 बजे तक महाश्मशान के अघोरी तंत्र-मंत्र की साधना से अग्नि कुंड में आहुति दे रहे हैं।
लकुलीश के पूजन से मिलती है तंत्र और श्मशान भय से मुक्ति
भगवान शिव के 28वें स्वरूप लकुलीश के पूजन से साधक को तंत्र-भय, श्मशान भय, मृत्यु भय एवं रोग से मुक्ति मिलती है। अघोराचार्य कपाली बाबा महाराज ने बताया कि अघोर परंपरा में गुरु को शिव का स्वरूप माना गया है। लकुलीश पूजन से गुरु तत्व प्रबल होता है।
मन की चंचलता, भय, क्रोध और मोह घटते हैं, जिससे साधना दीर्घकाल तक चल पाती है। नकारात्मक शक्तियां ऊपरी बाधाएं और तांत्रिक प्रभाव शांत होते हैं। भगवान लकुलीश का पूजन दूध या गंगाजल से अभिषेक कर चंदन एवं भस्म लगा कर किया जाता है। बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प चढ़ाने से लकुलीश प्रसन्न होते हैं।